बदलाव के साथ स्वयं को समायोजित करने का गुण हर परिस्थिति में कारगर

भारतीय मूल का व्यक्ति विश्व में कहीं भी, किसी भी देश में हो–एक अलग पहचान रखता है| भारतीय सभ्यता, संस्कृति की झलक व्यक्तित्व को एक अलग आभा प्रदान कर एक विशिष्ट पहचान देती है| उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, दिशाएँ महत्त्व नहीं रखती, महत्त्व होता है जड़ों का| भारत की मिट्टी से जुड़ाव, फिर वह जुड़ाव चाहे कितने ही वर्षों पुराना हो| जैसे एक परिवार के विभिन्न लोग अपना वैशिष्ट्य बनाये हुए भी एक-दूसरे से मिलते-जुलते-से लगते हैं वैसे ही विश्व के किसी कोने में रहने वाला भारतीय मूल का व्यक्ति एक विशेष आभा लिए इस बात में गर्व अनुभव करता है कि उसका जुड़ाव-लगाव भारत से रहा है|
जापान जैसे विकसित देश में रहते हुए डॉ रमा पिछले दो दशकों से जापान के प्रति अपने राष्ट्रप्रेम और नागरिक होने के कर्त्तव्यों को बखूबी निभाते हुए अपने मन में गहरे बसी भारतीयता को अपने लेखन के जरिये व्यक्त करती आ रही हैं|
कोरोना काल में जब सम्पूर्ण विश्व कोविड की विभीषिकाओं से जूझ रहा है तब अवसाद को अवसर में परिणित कर ‘हिन्दी की गूँज’ त्रैमासिक अन्तर्राष्ट्रीय ऑनलाइन पत्रिका ने जापान, भारत और विश्व के अन्यान्य देशों को हिन्दी साहित्यिक रचनाओं द्वारा आपस में जोड़ा है| गीत, ग़ज़ल, कविता, आलेख, निबंध, शोध पत्र, व्यंग्य, संस्मरण, कथा-कहानी, समीक्षा तथा डायरी-लेखन एवं साक्षात्कारों के माध्यम से इस काल की साहित्यिक सम्पदा को शब्दांकित कर वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को उपलब्ध करा रही है ‘हिन्दी की गूँज’ पत्रिका|

वैज्ञानिक आधार है, मधुर बहुत रसधार/ तुलसी, सूर, कबीर ने, लिख डाला संसार
लिख डाला संसार कि दुनिया अब तक बाँचे/ढाल रहे सब भाव, लिये हिन्दी के साँचे

हिन्दी की ध्वनि और उसकी प्रतिध्वनि वैश्विक पटल पर गुंजायमान है| सरल, सहज, सैद्धांतिक हिन्दी में वर्तमान का संकट, उसके परिणाम, उससे उभरने के उपाय, उसमें व्यवधान डालने वाले कारणों के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक व सामाजिक बदलावों को अनुभव के स्तर पर एक कवि, लेखक , कहानीकार, व्यंग्यकार कैसे देखता है, वर्तमान साहित्य उसी का आईना है| पिछली सदी या फिर उससे पिछली सदी में फैली इस तरह की वैश्विक महामारी का लिपिबद्ध साहित्य यदि विपुल मात्रा में उपलब्ध होता तो अवश्य इस चुनौती के समय हमारा पथ-प्रदर्शन कर हमें समय से पूर्व ही चेताता और इस घडी का सामना करने में भी अधिक सहायक हो पाता|
प्रत्यक्ष व् परोक्ष रूप से कोविड ने परिवारों को गहरा प्रभावित किया है| सोचने-समझने का दायरा और नज़रिया ही बदल डाला है| सब कुछ होते हुए भी अपने ही परिवारजनों, रिश्तेदारों, मित्रों से दूर हो कर जहाँ थे वहीँ ‘क़ैद’ हो कर एक लम्बी अवधि तक रह जाना; कामकाज, रोज़गार का सिमट जाना या लगभग समाप्त ही हो जाना, अपरिहार्य किन्तु अनिवार्य-सी बात हो गयी जन-जन के साथ| आर्थिक रूप से संपन्नता या सामाजिक रुतबा भी किसी काम का नहीं रहा या कहें नगण्य हो गया| मानसिक शिथिलता, ठहराव और खालीपन के साथ बीमारी से जूझते हुए कई अपनों को खो देने का दुःख नकारात्मकता का कारण बनता है इसमें कोई दो राय नहीं| साधारण व्यक्ति का ऐसे टूट कर बिखर जाना कोई असाधारण बात नहीं| ऐसा होते देखा भी हमने अपने आसपास| किन्तु कलम का धनी व्यक्ति अपनी ऊर्जा का सकारात्मक प्रयोग करते हुए अपनी पीड़ा को, अपने एहसासों को कागज़ पर उतार पाता है और यही कारण है कि साहित्य हर स्थिति में, हर युग में समाज के लिए उपयोगी शस्त्र भी साबित हुआ है शास्त्र होने के साथ-साथ| नैतिक बल प्रदान करती है रचनात्मकता| प्रेरित करती हर कठिन स्थिति से उभर कर आगे बढ़ने के लिए| मार्ग प्रशस्त करती है, दिशा दिखाती है| सही दिशा में उठाया हर सही क़दम  लक्ष्य प्राप्त करने में सहायक होता है|
सोशल मीडिया के इस दौर में अंतर्जाल के माध्यम से साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन करने वालों को खोज निकालना और उनसे संपर्क स्थापित करना भी तुलनात्मक रूप से सरल हो गया है|इस माध्यम का अत्युत्तम उपयोग हमने इस काल में किया भी है| जहाँ अपरिचित, अन्जान वस्तु को छूना ही प्रतिबंधित-सा हो गया हो वहाँ पुस्तकें, पत्रिकाएं, समाचारपत्रों का ऑनलाइन उपलब्ध होना किसी दैवीय वरदान से कम साबित नहीं हुआ है इन पिछले डेढ़ वर्षों में| साथ ही कवि-सम्मेलन, मुशायरे और गोष्ठियाँ भी यथार्थ के धरातल से सिमट कर वर्चुअल/ आभासी पटल का उपयोग करके होने लगे| वैसे भी मनुष्य का बदलाव के साथ स्वयं को समायोजित करने का गुण हर परिस्थिति में उसके काम आता है और ऐसे में कोरोना काल कोई अपवाद नहीं लगा| लोग घर बैठ गए, सड़कें वीरान और आकाश भी हवाई जहाजों से रिक्त हो गया| इस बदली परिवेश ने प्राकृतिक वातावरण को कुछ ही समय में प्रदुषण मुक्त कर इतना स्वच्छ और सुरक्षित कर दिया था पिछले वर्ष कि पशु-पक्षियों की विलुप्त और हमसे दूर होती हुई प्रजातियाँ भी अचानक दिखाई देने लगीं, शहरों में पत्तों और फूलों के रंग चमक उठे क्योंकि हवा  स्वच्छ व् निर्मल हो गयी और नभचरों को आकाश में हवाई यात्रा करने वाले जहाजों से दुर्घटना का भय कम हो गया था|
खैर! ऐसा कब तक रहता? अर्थव्यवस्था को भी तो संभालना था| वैक्सीन भी बहुत जल्दी निर्मित हो गयीं| भारत जैसे विकासशील देश  में ये चमत्कार से कम नहीं था| युद्धस्तर पर टीकाकरण व् अन्य सुविधाओं ने जन-जीवन बहुत हद तक सामान्य कर दिया यद्यपि आक्रामक तीसरी लहर के अंजाने डर का काला बादल अभी भी छटा नहीं है| लेकिन कहते हैं- डर के आगे जीत है|
विजय की इसी छत्रछाया में ‘हिन्दी की गूँज’ का यह अंक जब आपके हाथों में आ रहा है जब अक्टूबर, नवम्बर और दिसंबर के ये तीन महीने भारत में और भारत से बाहर भारतीयों के लिए विभिन्न पर्व लिए हर्षो-उल्लास के हैं| गाँधी-शास्त्री जयंती, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली, गोवर्धनपूजा, भैया दूज  ईद, गुरुनानक जयंती और क्रिसमस इत्यादि विभिन्न त्योहारों की शुभकामनाओं के साथ पत्रिका के सम्पादन व प्रकाशन मंडल को धन्यवाद देना चाहूंगी कि मुझे आप सरीखे सुधि, सहृदय पाठकों को संबोधित करने का सुअवसर प्रदान किया|

अपनी और अपनों की ख़ुशियों का ध्यान रखियेगा| कोविड-संबधित सभी नियमों का सतर्कता से पालन करते हुए त्योहारों और साहित्य का आनंद लीजियेगा|

 

पूनम माटिया

(कवयित्री-शायरा-लेखिका)

अध्यक्ष, अंतस्( साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक संस्था)

9312624097
poonam.matia@gmail.com

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